घर के मंदिर में किन देवताओं की मूर्तियाँ साथ न रखें?
शास्त्र, परंपरा और वास्तु के अनुसार संपूर्ण मार्गदर्शन
घर का मंदिर केवल पूजा करने का स्थान नहीं होता, बल्कि वह घर की आध्यात्मिक ऊर्जा, शांति और संतुलन का केंद्र होता है।
शास्त्रों और वास्तु शास्त्र में यह स्पष्ट बताया गया है कि यदि पूजा-घर में मूर्तियों का स्वरूप, संख्या या संयोजन सही न हो, तो पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
इसी कारण Jipanditji आपके लिए यह मार्गदर्शक लेख लेकर आया है, ताकि आप अपने घर के मंदिर को शास्त्रसम्मत और मंगलमय बना सकें।
1. खंडित या टूटी हुई मूर्तियाँ क्यों नहीं रखनी चाहिए?
यदि किसी देवी-देवता की मूर्ति:
टूटी हो
खंडित हो
चेहरा, हाथ या अंग क्षतिग्रस्त हों
तो ऐसी मूर्ति को पूजा-घर में रखना वर्जित माना गया है।
शास्त्रों के अनुसार, खंडित मूर्तियाँ ऊर्जा असंतुलन और मानसिक अशांति का कारण बन सकती हैं।
👉 ऐसी मूर्तियों को पूरे सम्मान के साथ जल में प्रवाहित या पवित्र स्थान पर मिट्टी में विसर्जित करना चाहिए।
2. उग्र स्वरूप की मूर्तियाँ घर के मंदिर में क्यों नहीं रखनी चाहिए?
घर का मंदिर शांत, सात्त्विक और सौम्य ऊर्जा का स्थान होता है। इसलिए निम्न उग्र स्वरूप घर के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते:
काल भैरव या भैरव स्वरूप
माँ काली का उग्र या तांत्रिक रूप
दक्षिणमुखी हनुमान जी
क्रोधित गणेश या उग्र शिव स्वरूप
👉 इन स्वरूपों की पूजा विशेष साधना और विधि से होती है, जो सामान्य गृहस्थ जीवन में कठिन मानी जाती है।
✔ घर के मंदिर में शांत और कल्याणकारी स्वरूप ही स्थापित करने चाहिए।
3. किन देवताओं की मूर्तियाँ साथ नहीं रखनी चाहिए?
वास्तु और शास्त्र के अनुसार कुछ देवताओं की ऊर्जा भिन्न होती है, इसलिए उन्हें एक साथ स्थापित करना उचित नहीं माना गया है:
शनि देव और शिव जी
हनुमान जी और शनि देव
माँ काली और माँ लक्ष्मी की मूर्तियाँ साथ
👉 इन संयोजनों से घर में मानसिक तनाव, पारिवारिक अशांति या बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
घर के मंदिर में मूर्ति रखने के आवश्यक वास्तु नियम
✔ मंदिर की सर्वोत्तम दिशा: उत्तर-पूर्व (ईशान कोण)
✔ मूर्तियाँ कभी फर्श पर न रखें
✔ एक देवता की बहुत अधिक मूर्तियाँ न रखें
✔ मूर्तियों के पीछे दीवार से थोड़ी दूरी रखें
✔ सोते समय पूजा-घर ठीक सामने न हो
👉 सही दिशा और व्यवस्था से पूजा फलदायी बनती है।
ये नियम क्यों आवश्यक हैं?
देवताओं की मूर्तियाँ केवल प्रतीक नहीं, बल्कि चेतना और श्रद्धा का माध्यम होती हैं।
सही स्वरूप और सही संयोजन से:
पूजा में स्थिरता आती है
घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है
साधना का प्रभाव बढ़ता है